जोशीमठ का दर्द !
महाराष्ट्र के किसी दूरस्थ क्षेत्र मित्र के साथ घूमने गया था। जंगल-खेत-खलिहान की सैर।
शाम को लौटना था। देर हो गयी। तब तक पूरे क्षेत्र में अंधेरा पसर गया। बाइक पर थे और जिस गांव से लौटना था, वहां से राजमार्ग की दूरी लगभग 15 किलोमीटर थी।
समय रात्रि के लगभग 8 बजे।
लौटते हुए लगभग आधी दूरी ही तय की थी कि अचानक बाइक पंचर हो गयी... अब क्या करें। सड़क पर आवाजाही लगभग शून्य...बस्ती और राजमार्ग के बीच हल्के अंधियारे में कभी-कभार एकाध बल्ब के साथ नज़रों से गुजरती कोई दुकान और फिर घटाटोप अंधेरा और लंबी सूनी सड़क।
अब क्या करें...गहरी चिंता में डूबे।
...लेकिन अंधेरे में भी उम्मीद रोशन होती है...एक शख्स नज़र आया...अंधेरा कितना भी घना हो, कुछ #लोग नज़र आ ही जाते हैं...अंधेरे में टकराये शख्स ने बताया थोड़ी दूरी पर ही एक पंचरवाला है। पर दुकान खुली होगी, नहीं होगी, नहीं जानता...।
उम्मीद को इतनी भी उम्मीद मिल जाए तो वह बहुत बड़ी उम्मीद बन जाती है...और उम्मीद बिजली-सी कौंध गयी।
बाइक ठेलते पहुंचे तो बल्ब टिमटिमा रहा था। उसकी रोशनी में कोई मानवाकृति झिलमिला रही थी। ख़ुशी से उछल पड़े।
पंचर समय पर ही हुआ था ☺️☺️☺️आगे होता तो आफत तय थी...शख्स दुकान बंद कर घर जाने की तैयारी ही कर रहा था।
वह पंचर बनाने जुट गया...लगभग 20 मिनट लगे...परंतु वह 20 मिनट गुज़रे हुए हजारों लम्हों पर भारी हैं...।
उसने एक गीत (या कुछ और) लगा रखा था...घुप्प अंधेरे में कहीं दूर से पीड़ा में डूबी, कराहती आवाज़...उस गीत ने जाने क्या तिलस्म रचा कि आज तक उस जगह से हिल नहीं पाया हूं...लौट तो आया हूं, पर मन वहीं स्थिर है...जीवन के कई #पंचर ठीक करवाता हुआ-सा।
आज वर्षों बाद #NDTV के वरिष्ठ संवेदनशील पत्रकार श्री Sushil Bahuguna जी की wall पर इस वीडियो से टकराया, तो मन उस वीरानी से उड़ कर जोशीमठ की धंसती जमीन पर जा खड़ा हुआ...और अब मैं कराहते हुए धीरे-धीरे उस जमीं पर धंसता चला जा रहा हूं।
#पंचरवाला_मुस्लिम था। उस #गीत के बारे में पूछने पर उसने कुछ बताया भी, पर याद नहीं। शायद अरेबिक भाषा में कोई आयत या कुछ और थी !
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